जनसंख्या विस्फोट: एक समस्या

विश्व की जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट रूप से स्वीकार की गई है कि विश्व की जनसंख्या वृद्धि दर में जो कमी आई है, उसका कारण चीन सरकार द्वारा उठाए गए कारगर कदम हैं। चीन की सरकार यह भतीभँति जानती है कि जनसंख्या को रोक बिना आर्थिक उपलब्धियाँ नहीं हो सकती।

यदि हम भारत की स्थिति पर विचार करें तो हमें ज्ञात होगा कि 2001 की जनगणना के अनुसार देश की जनसंख्या 100 करोड़ को पार कर गई है। अब यह आँगडा़ 105 करोड़ छू रहा है। इतनी विशाल जनसंख्या को उपयोग की वस्तुएँ उपलब्ध कराना अपने आप में एक समस्या है। भारत एक गरीब देश हैं इसके संसाधन भी सीमित हैं। जनसंख्या वृद्धि पर काबू पाए बिना देश में आर्थिक सम्पन्नता लाना अत्यंत कठिन है। जनसंख्या वृद्धि से बहुत अधिक समस्याएँ अत्पन्न होती हैं।

जनसंख्या वृद्धि से अधिक आवासीय स्थजों की आवश्यकता होती है। अधिक मकान बनाने के लिए अधिक भूमि की आवश्यकता होती है। इससे भूमि पर दबाव पड़ता है। कृष योग्य भूमि धन के लालच में बेच दी जाती हैै। कृषि-उत्पादन में गिरावट होती है। आज शहरीकरण के कारण सीमाएँ फैलती जा रही हैं। इस प्रवृति को रोका जाना नितांत आवश्यक है।

अधिक आबादी के लिए अधिक वस्तुओं की आवश्यकता होगी । न केवल उदरपूर्ति के लिए बल्कि अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिक संसाधन जुटाने होंगे। यदि साधन पर्याप्त न हुए तो देश की स्थिति विषम हो जायेगी। अधिक आबादी के लिए अधिक अनाज, अधिक तेल, अधिक कपडा़, अधिक पानी, अधिक यातायात के साधनों की आवश्यमता होगी। पेट्रोल की भी अधिक आवश्यकता होगी। यह सब कैसे प्राप्त किया जाएगा? पैट्रलियम उत्पादों के बारे मे विशेषज्ञों का मत है कि वह 40-50 वर्षो में समाप्त हो जायेगे।

जनसंख्या-वृद्धि के कारण शिक्षा-सुविधाओं का आभाव महसूस किया जा रहा है। देश की बहुसंख्या को शिक्षा की प्रथमिक सुविधाएँ भी नहीं मिल पा रही हैं। देश में पर्याप्त मात्रा में प्रथमिक स्कूल, माध्यमिक स्कूल, काॅलेज व शैक्षणिक संस्थाओं का आभाव है। जब तक देश के सभी बच्चों को शिक्षा की सुविधा नहीं मिलेगी तब तक इस देश का सर्वांगीय विकास संभव नहीं है। इस देश की समस्त समस्याओं के मूल में अशिक्षा है।

जनसंख्या-वृद्धि के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं की भी बहुत कमी है। देश की अधिकांश जनसंख्या को स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधएँ भी प्राप्त नहीं हैं। सरकारी अस्पतालों की संख्या सीमित है। जो सरकारी अस्पताल हैं उनमें बहुत अधिक भीड़ है। देश की गरीब जनता निजी अस्पतालों का महँगा खर्च वहन नहीं कर सकती। इस वजह से गरीब लोग इन सुविधाओं के आभाव में मरने को मजबूर हैं।

हर व्यक्ति चाहता है कि उसे रोजगार उपलब्ध कराया जाए। इसके साथ-साथ अधिक संतान उत्पन्न करना भी प्रत्येक व्यक्ति अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है। सरकार के लिए यह संभव नही है कि वह नियोजन के बिना सबको रोजगार उपलब्ध कराए। इसके साथ-साथ सबको रोजगार न मिलने पर अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इससे आर्थिक अपराध बढ़ते हैं। समाज मंे अव्यवस्था फैलती है। राज्य के राजस्व पर अधिक बोझ पड़ता है। इससे देश में असंतोष पैदा होता है। शासन-व्यवस्था में अस्थिरता आती है। इससे देश कमजोर होता है और उसकी एकता एवं अखंडता खतरे में पड़ जाती है। छोटी-छोटी सी समस्याओं को लेकर आंदोलन चलते रहते हैं। इसके लिए राजनीतिक दल भी पूरी तरह उत्तरदायी हैं। वे निकृष्टतम हथकंडे अपनाने तक को तैयार हो जाते हैं।

उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि जनसंख्य-वृद्धि किसी भी दृष्टि से किसी भी देश के लिए हितकर नहीं है। इसे रोकना होगा। देश तभी प्रगति के तथ पर आगे बढ़ सकेगा जब परिवार नियोजित रहें। जनसंख्या वृद्धि सबसे अधिक निर्धन वर्ग में होती है। प्रश्न यह उठता है कि जनसंख्या पर काबू किन उपायों से पाया जा सकता है।

जनसंख्या रोकने के लिए सर्वप्रथम जागरूकता का होना आवश्यक है। लोगों को यह समझाना होगा कि छोटा परिवार सुखी परिवार होता है। यदि परिवार छोटा होगा तो माता-पिता अपनी संतान का पालन-पोषण बेहतर ढ़ंग से कर सकंेगे, उन्हें बढ़िया कपडे़ , पौष्टिक भोजन एवं अच्छी शिक्षा दिलाई जा सकती है। बच्चों एवं माताओं के स्वस्थ रहने के लिए परिवार को नियंत्रण में रखना आवश्यक है।

लड़के के पैदा होने की कामना भी जनसंख्या को बढ़ाती है। अब हमें लड़के-लड़की को एक समान मानना होगा। समाज में लड़की को सम्मान दिलाने से भेदभाव स्वयं मिट जाएगा। इसके बाद हम लड़की के बाद लड़के की कामना करना स्वयं छोड़ देंगे। ’एक ही संतान काफी है’ -यह विचार परिवार नियोजन के लक्ष्य को पूरा कर सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *